गुरुवार, 17 मार्च 2011
उल्टा है जमाना उल्टे चलो
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एक थे बाबाजी। फक्कड़ टाइप के थे, जंगल में रहते थे। इनका नियम था कि रोज सुबह उठते ही डटकर भोजन करते थे। इसके बाद स्नान करते थे फिर दातुन आदि ...
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शनिवार, 5 मार्च 2011
तेरा क्या और मेरा क्या?
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अस्सी और नब्बे के दशक में दूरदर्शन में ऐसे अनेक कार्यक्रम आया करते थे जिन्हें याद करके किसी का भी नॉस्टेलजिक हो जाना स्वाभाविक है । मेरा...
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गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011
फ़र्ज़ और फर्क
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बहुत भीड़ थी ट्रेन में. स्लीपर का डिब्बा भी जनरल बोगी जैसा लग रहा था. उस दिन कोई त्यौहार था और कोई मेला था मथुरा में. जैसे ही गाड़ी गंज बा...
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गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011
सवाल कुछ न पूछिए
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हो गए हैं किस क़दर बेहाल कुछ न पूछिए। हर तरफ फैला हुआ है जाल कुछ न पूछिए। उस गाँव तक पक्की सड़क मंजूर तो हो गई, कितने मगर उसमें लगेंगे साल ...
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शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2011
प्रेम में डूबी हुई लड़की की ब्लॉग कथा
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कथासूत्र को समझने के लिए इस कहानी को पढ़ने से पूर्व इसकी पूर्वकथा को पढ़ना उचित रहेगा। लड़की अब पूरी तरह प्रेम में डूब चुकी थी। वह दिन रात...
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शनिवार, 5 फ़रवरी 2011
एक अकेली और उदास लड़की की ब्लॉग कथा
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वह लड़की अकेली थी। अकेली और उदास। कोई साथी नहीं था उसका। अकेले अपने कमरे में बैठे बैठे सपने बुना करती थी। सपने जिनके सच होने की उम्मीद भी उस...
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