मंगलवार, 18 फ़रवरी 2014
कहीं तो होगी वो दुनिया
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क हीं तो होगी वो, दुनिया जहाँ तू मेरे साथ है.... जहाँ मैं, जहाँ तू और जहाँ बस तेरे-मेरे ज़ज्बात हैं... लड़के ने गुनगुनाना शुरू किया ही था ...
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रविवार, 24 नवंबर 2013
एक नयी शुरुआत
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को ई सात साल पहले मैं हिंदी ब्लॉग जगत से परिचित हुआ था। पढ़कर खुद भी ब्लॉगिंग करने की इच्छा हुई तो मैंने भी ब्लॉग बना लिया। तब कबीर का एक प...
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गुरुवार, 17 मार्च 2011
उल्टा है जमाना उल्टे चलो
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एक थे बाबाजी। फक्कड़ टाइप के थे, जंगल में रहते थे। इनका नियम था कि रोज सुबह उठते ही डटकर भोजन करते थे। इसके बाद स्नान करते थे फिर दातुन आदि ...
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शनिवार, 5 मार्च 2011
तेरा क्या और मेरा क्या?
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अस्सी और नब्बे के दशक में दूरदर्शन में ऐसे अनेक कार्यक्रम आया करते थे जिन्हें याद करके किसी का भी नॉस्टेलजिक हो जाना स्वाभाविक है । मेरा...
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गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011
फ़र्ज़ और फर्क
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बहुत भीड़ थी ट्रेन में. स्लीपर का डिब्बा भी जनरल बोगी जैसा लग रहा था. उस दिन कोई त्यौहार था और कोई मेला था मथुरा में. जैसे ही गाड़ी गंज बा...
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गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011
सवाल कुछ न पूछिए
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हो गए हैं किस क़दर बेहाल कुछ न पूछिए। हर तरफ फैला हुआ है जाल कुछ न पूछिए। उस गाँव तक पक्की सड़क मंजूर तो हो गई, कितने मगर उसमें लगेंगे साल ...
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