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गुरुवार, 17 मार्च 2011

उल्टा है जमाना उल्टे चलो

एक थे बाबाजी। फक्कड़ टाइप के थे, जंगल में रहते थे। इनका नियम था कि रोज सुबह उठते ही डटकर भोजन करते थे। इसके बाद स्नान करते थे फिर दातुन आदि करते थे और उसके बाद शौच निवारण के लिए जाया करते थे। किसी ने पूछा महाराज सब तो पहले नित्य कर्म निपटाते हैं फिर स्नान करके भोजन ग्रहण करते हैं तो आप ये उलटा क्रम क्यों अपनाए हुए हैं? बाबा जी ने जवाब दिया -"भाई ये सारे नियम तो लोगों के बनाए हैं हम क्यों इन्हें अपनाएँ? हम तो अपना नियम खुद ही बनाते हैं, और वैसे भी जब ज़माना ही उल्टा है तो उल्टे चलने में ही भलाई है।"

ये तो था "अवधड़ बाबा का अवधड़ ज्ञान, पहले भोजन फिर स्नान" पर मैं सोच रहा हूँ की ज़माना तो सचमुच उल्टा ही है तो क्यों न कभी कभी उल्टा ही चलकर देखा जाए। आखिर औरों से कुछ हटकर तो होना ही चाहिए।

मसलन जैसे यदि कभी आप 'नो पार्किंग' में गाड़ी खड़ी कर दें तो पुलिस वाला आएगा गाड़ी उठा ले जाएगा या चालान काट देगा। आप आयेंगे, मिन्नतें करेंगे और पैसे देकर अपनी गाड़ी छुडायेंगे। इससे तो बेहतर है कि जाते ही पहले पुलिस वाले को सौ का नोट पकड़ाओ और शान से अपनी गाड़ी नो पार्किंग में टिका दो।

या पहले अपनी बीवी को कोई अच्छा सा तोहफा दो, आठ- दस बार उससे माफी मांगो और फिर जमकर झगड़ा करो। जो बीवी से झगड़ने के बाद करना है वो पहले ही कर लो।

ब्लॉग जगत में भी ये उल्टा चक्कर चलाया जा सकता है. जैसे कि-

# लोग टिप्पणी के बाद अपना लिंक छोड़ते हैं तो क्यों न ये किया जाए कि पहले तो अपने चार पांच लिंक टिकाएं जाएं फिर उसके नीचे एक लाइन की टिप्पणी चिपका दी जाए।

# हम पहले पोस्ट पढ़ते है ( या देखते हैं) फिर टिप्पणी देते हैं कभी यही करें कि पोस्ट आने से पहले ही टिप्पणी दे डालें. कुछ इस तरह-

आदरणीय/ प्रिय ............ जी आप कल/ परसों/ नरसों जो पोस्ट करने वाले हैं वह बहुत उम्दा है। मुझे बहुत ही अच्छा लगेगा। इस बेहतरीन प्रस्तुति के लिए मेरी अग्रिम बधाईयाँ स्वीकार करें। धन्यवाद।
( वैसे भी लिखना तो यही है और पोस्ट पढ़ना किसने है ) :)

तरीके और भी हो सकते हैं। आप सोचिये और तब तक मुल्ला नसरुद्दीन का एक किस्सा ही सुन लीजिये-

गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

सवाल कुछ न पूछिए

हो गए हैं किस क़दर बेहाल कुछ न पूछिए।
हर तरफ फैला हुआ है जाल कुछ न पूछिए।

उस गाँव तक पक्की सड़क मंजूर तो हो गई,
कितने मगर उसमें लगेंगे साल कुछ न पूछिए।

दो बाल्टी पानी के लिए जंग छिड़ गई,
टैंकर से लगी भीड़ और बवाल कुछ न पूछिए।

बाबू मजे से बैठकर सब खेलते हैं ताश,
दफ्तर में हो गई है हड़ताल कुछ न पूछिए।

चार गुना दाम में बिकने लगे अनाज,
छाया हुआ क्षेत्र में अकाल कुछ न पूछिए।

पक्ष औ' विपक्ष में हुई जम के मारपीट,
दिल्ली है या लखनऊ कि भोपाल कुछ न पूछिए।

इंसान के ही जान की कीमत नहीं रही,
बिकता है यहाँ यूँ तो हर माल कुछ न पूछिए।

जमाने का भी आजकल दस्तूर है 'सोमेश',
जैसा है चलने दीजिए सवाल कुछ न पूछिए।

- सोमेश सक्सेना

बुधवार, 15 दिसंबर 2010

क्योंकि हर बात की एक हद होती है

पेश हैं कुछ हल्के-फ़ुल्के गुदगुदाते जुमले। इनमें से कुछ तो मैने E-mails और sms से संकलित और अनुवादित किए हैं और बाकी अपने तरफ से जोड़े हैं। उम्मीद है आपके चेहरे पर मुस्कुराहट लाने के अपने उद्देश्य में कामयाब रहूँगा।
गोपनीयता की हद:
जब कोई किसी को ’ब्लेंक विज़िटिंग कार्ड’ दे...

बुद्धिमानी की हद:
जब कोई कोरे कागज़ की फोटो कॉपी करवाए...

भुलक्कड़पने की हद:
जब कोई आइना देखकर याद करने की कोशिश करे कि पहले इसे कहाँ देखा है...

मूर्खता की हद:
जब कोई ’ग्लास डोर’ के ’की होल’ से अंदर झाँककर देखने की कोशिश कर रहा हो...

ईमानदारी की हद:
जब कोई गर्भवती महिला डेढ़ टिकट लेकर यात्रा करे...

आलस की हद:
जब कोई ’मॉर्निंग वाक’ पर निकले और घर जाने के लिए ’लिफ्ट’ मांगे...

आत्महत्या की हद:
जब कोई बौना मरने के लिए ’फुटपाथ’ से कूदे...

निर्जलीकरण (डिहाइड्रेशन) की हद:
जब कोई गाय दूध पाउडर दे...

कंजूसी की हद:
जब किसी के घर में आग लग जाए और वह ’फायर ब्रिगेड’ को ’मिस्ड कॉल’ करता रहे...

देशभक्ति की हद:
जब कोई अपने देश की माटी में पड़े गोबर और मल को भी माथे से लगाए...

नियम कायदे की हद:
जब कोई सरकारी अधिकारी ’घूस’ की भी रसीद दे...

प्यार की हद:
जब प्रेमिका के मरने के बाद प्रेमी उसकी चिता पर बिस्तर लगाकर सोना शुरू कर दे।

फैशन की हद:

शनिवार, 11 दिसंबर 2010

डॉक्टर की दुकान में ग्राहकों की भीड़


पिछले हफ्ते की ही बात है। मेरे एक परिचित को तेज पीठ दर्द की तकलीफ थी। उन्हे लेकर डॉक्टर के पास जाना था, तो उन्ही के बताए एक डॉक्टर के पास गए जिनके बारे में उनका कहना था कि वे शहर के सबसे अच्छे हड्डी रोग विशेषज्ञों में से एक हैं। मैं इन डॉक्टर के बारे में कुछ भी नहीं जानता था। डॉक्टर के क्लिनिक के बाहर लगी भीड़ से ये अंदाजा हो गया कि उनकी प्रेक्टिस अच्छी चलती है। अंदर गए तो वेटिंग हाल में भी कुछ लोग बैठे थे। डॉक्टर का केबिन शायद अंदर की तरफ था जहाँ जाने के लिए एक खुला दरवाजा नज़र आ रहा था। वहीं एक कम्पाउंडर नुमा आदमी बैठा था। मैं उसके पास गया और पूछा कि डॉक्टर साहब हैं, उसके हाँ कहने पर मैने अर्ज किया कि दिखाना है आप मरीज का नाम लिख लो। इस पर उसने जानकारी दी कि यहाँ नाम लिखाने की जरूरत नहीं है। आप बैठिए।

चलिए ये भी ठीक है मैने सोचा और जाकर बैठ गया। मुझे लगा कि वो आदमी खुद ही ध्यान रखेगा कि कौन पहले आया और कौन बाद में और उसी क्रम से लोगों को बुलाता रहेगा। पर काफी देर तक बैठे रहने पर मैने महसूस किया कि इतनी देर में कोई अंदर नहीं गया, हाँ कुछ लोग बाहर आते जरूर दिखे। फिर वो आदमी भी अपनी जगह नहीं था बल्कि इधर उधर हो रहा था। मेरी बैचेनी थोड़ी बढ़ गई। मैं उठकर डॉ. के केबिन के पास गया। वहाँ एक दूसरा बंदा खड़ा था। मैने उसी से पूछा-

"क्यों भाई डॉ. साहब नहीं हैं क्या?"

"हैं न, अंदर हैं।"

"दिखाना है, टाइम लगेगा क्या?"

"दिखाना है तो चले जाओ अंदर"

ये सुनकर तो मेरी बाँछें खिल गई। मुझे लगा कि डॉ. खाली होगा। मैने तुरंत मरीज को आवाज लगायी, आ जाओ, आ जाओ फटाफट। पर जैसे ही उन्हे लेकर मैं अंदर गया वहाँ का दृश्य देखकर ठिठक कर रह गया।

अंदर एक बड़ी सी टेबल रखी थी और उसके पीछे डॉ. बैठा हुआ था। पर मैं न तो डॉ. को देख पा रहा था और न ही टेबल को, क्योंकि उस टेबल के इस और लगभग १५-२० लोगों की भीड़ लगी हुई थी। पहली नज़र में ही समझ आ गया कि ये सब मरीज और उनके परिजन हैं। अब जरा वहाँ का आँखों देखा हाल भी सुनिए-

गुरुवार, 25 नवंबर 2010

आँख मूँद कर पढ़ने वाले उर्फ़ चाट और कुल्फी

ड़ा ही अजीब लड़का था वो। पर कुछ भी कहो बात तो पते की कह गया।

हुआ यूँ कि उस दिन मैं सब्जी लेने बाज़ार गया था। तो जब एक चाट के ठेले के पास खड़ा सोच रहा था कि कौन सी सब्जियाँ ली जाएँ एक लड़का अचानक चाट वाले के पास पहुँचा और जोर से बोला- "भाई एक कुल्फी देना।"

चाट वाले से कुल्फी? सुनकर मेरे कान खड़े हो गए। बड़ा बेवकूफ़ है, मैने सोचा और उसकी तरफ़ निगाह फेरी।

सोचा चाट वाले ने भी यही होगा, बोला- "अरे भाई दिखता नहीं क्या? मैं चाट बेच रहा हूँ, कुल्फी नहीं।"

"कुल्फी तो देना ही पड़ेगा। तुम्हारे ठेले पर तुमने लिखवा जो रखा है- श्री कुल्फी सेंटर।" सचमुच लिखा तो यही था उस ठेले पर, मैने भी ध्यान दिया।

"अरे भाई पहले इस ठेले पर कुल्फियां बेचता था पर अब तो चाट बेच रहा हूँ न।"

"अब चाट बेच रहे हो तो नाम क्यों नहीं बदलवाया? कुल्फी तो तुम्हे देनी ही पड़ेगी।"

"अरे नहीं बदलवाया तो क्या जान लोगे। चाट खाना है तो खाओ नहीं तो मेरा टाइम खोटा मत करो। ग्राहक खड़े हैं।"

"नहीं, खा के मैं कुल्फी ही जाउँगा चाहे कहीं से लाओ। अब गलती तुम्हारी है तो मैं क्यों भुगतूं।"

"अरे पागल है क्या, भाग यहाँ से" चाट वाले को अब गुस्सा आ गया। और बस दोनो मे बहस शुरु हो गई।

कुछ देर तक तो मैं बहस का मजा लेता रहा फिर मुझसे रहा नहीं गया। लड़के को मैने एक तरफ खींचा और कहा - "क्यों उस गरीब को परेशान कर रहे हो यार?"

" अरे साहब मैं कोई जानबूझ कर परेशान नहीं कर रहा हूँ, मैं तो बस परंपरा का पालन कर रहा हूँ. "

" परंपरा का पालन? मैं समझा नहीं?"

"देखिए जनाब हमारे यहाँ एक परंपरा यह भी रही है के जो पढ़ो उसी पर यकीं करो जो देखो सुनो उसे झुठला दो। तो आखिर मैं भी तो यही कर रहा हूँ न?"

"अच्छा! पर बात कुछ समझ नहीं आई।"

शनिवार, 13 नवंबर 2010

यह अपना क्षेत्र नहीं है...

उस दिन की बात है। मैं चौराहे की चाय की दुकान के सामने खड़ा था। इंजीनियरिंग के कुछ छात्र भी वहाँ चाय की चुस्कियाँ मार रहे थे। तभी एक बाइक में दो पुलिस वाले वहाँ आए। एक तो पास की पान की दुकान की तरफ बढ़ गया, दूसरा जिसके हाथ में एक रज़िस्टर था उन लड़कों के पास आया। कुछ क्षण वह खड़ा होकर अपने रज़िस्टर में देखता रहा फिर उन लड़कों से मुख़ातिब होकर कहा- 

"आप लोग कहाँ रहते हैं?"

"साकेत नगर में!" एक ने कहा।

"क्या करते हो?"

"जी, हम लोग स्टुडेँट हैं, बी. ई. कर रहे हैं।" दूसरे ने कुछ हिचकिचाते हुए कहा।

"तो किराये से रहते होगे?"

"जी सर!" लड़को के साथ मैं भी सोच रहा था कि ये सब क्यों पूछा जा रहा है।

"आप लोगों ने पुलिस थाने में अपनी डिटेल्स दर्ज करवायी है?"

"जी..." लड़के एक दुसरे का मुंह देख रहे थे।

"अच्छा आपने अपने मकान मालिक को अपनी फोटो और एड्रेस वगैरह दिया है?"

"हाँ सर" एक लड़के ने धीरे से कहा, बाकी चुप रहे।

"देखिये घबराइये नहीं, आप लोगों को तो पता ही होगा कि हर मकान मालिक के लिए अपने किरायेदार की पूरी जानकारी थाने मे लिखवाना जरूरी होता है। आजकल वारदात बहुत हो रहे हैं न बेटा।" लड़कों ने सर हिलाया।

"लेकिन ज्यादातर मकान मालिक ऐसा करते नहीं है। अब कल को कुछ हुआ तो परेशान तो आपको ही होना पड़ेगा न? पर ये समझते ही नहीं हैं।"

"सही बात है सर।" लड़के सोच रहे होंगे कहाँ से आफ़त गले पड़ गई।

"इसीलिए हम लोग खुद ही घर घर जाकर जानकारी जुटा रहे हैं। और इसमे घबराने की कोई बात नहीं है भई ये आप लोगो की सुरक्षा के लिए ही कर रहे हैं।"

"हाँ सर ये तो है।" एक लड़के ने दांत निपोरे। उस पुलिस वाले को इतने प्यार से समझाते देख मुझे जाने क्यों अच्छा लग रहा था।

शुक्रवार, 16 फ़रवरी 2007

ट्रक, कुत्ते और कविता

भोपाल शहर की बात कर रहा हूँ पर ये नज़ारा तो किसी भी शहर में आम हो सकता है। रोज सुबह मैं अपनी बाइक की सवारी करते हुए कॉलेज जाता हूँ जहाँ मैं पढ़ाता हूँ। कॉलेज शहर के बाहर है हाईवे पर। बहुत सी चीज़ों पर ध्यान जाता है पर एक चीज़ ने मुझे कई दिनों से विचलित कर रखा है। आये दिन कोई न कोई कुत्ता किसी ट्रक या बस के पहियों के तले कुचलकर मारा जाता है। उसी एक सड़क पर पिछले दिनों न जाने कितने कुत्तों की लाशों को मैने देखा है। अब उस लाश का क्या होता है? रोज़ आती जाती गाड़ियों के तले वह कुचलता जाता है। धीरे धीरे वह कालीन की तरह डामर में बिछता जाता है और इसी तरह गायब भी हो जाता है।

उफ ! क्या किसी प्राणी का अंत इससे भी बुरा हो सकता है? शायद इसीलिये कुत्ते की मौत वाली कहावत बनी है। कई बार तो ये भी होता है कि ताज़ा कुचले कुत्ते के पास कुछ पिल्ले चिपके होते हैं अपने माँ या बाप की लाश को सुंघते हुए। पिछले हफ्ते जो देखा वो तो और भी दिल दहलाउ है। एक के बाद एक तीन मासूम पिल्ले कुचले पड़े थे। मासूम सपनों की लाश। जाने क्यों उस रास्ते पर इतने कुत्ते मारे जाते है ? और मैं... सिवा देखने के कुछ नहीं कर पाता। अजीब बेबसी है।

मुझे अपनी ही एक कविता याद आती है जो मैने कुछ साल पहले लिखी थी। वह कविता ये रही।



इंसानियत

भीड़ भरे बाजार में
किसी रोज
किसी गाड़ी से कुचलकर मारा जाता है
कोई आवारा कुत्ता
पर किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ता
सिवा इसके कि वहाँ से
गुजरते समय ढ़ांप लिया जाता है
नाक को रुमाल से
जब बात हद से बढ़ जाती है
तो फोन किया जाता है नगर निगम को
और हटवाई जाती है कुत्ते की लाश।

उसी बाजार में एक दिन
कोई ट्रक वाला कुचल देता है
किसी पैदल राहगीर को
और जब वह पड़ा तड़प रहा है
तब भीड़ हो जाती है क्रुद्ध
उतारती है ड्रायवर को ट्रक से
पीटती है उसे तब तक
जब तक अधमरा नहीं हो जाता वह
राहगीर दम तोड़ देता है
घटनास्थल पर ही
भीड़ का ग़ुस्सा
सातवें आसमान पर पहुंच जाता है।
ट्रक को कर दिया जाता है
आग के हवाले
पर इससे ही संतुष्ट नहीं होती भीड़
किया जाता है उस जगह
चक्का ज़ाम
किया जाता है थाने का घेराव
लगाये जाते हैं नारे।

शाम को ये लोग लौटते हैं घर
होकर खुश और संतुष्ट
यह सोचते हुए
कि आज हमने किया इंसानियत का काम।

- सोमेश सक्सेना (१७ अक्टूबर २००२)