कथासूत्र को समझने के लिए इस कहानी को पढ़ने से पूर्व इसकी पूर्वकथा को पढ़ना उचित रहेगा।
लड़की अब पूरी तरह प्रेम में डूब चुकी थी।
वह दिन रात लड़के के ही ख्यालों में खोई रहती। उसने अब प्रेम कवितायेँ लिखना शुरू कर दिया था। प्रेम और खुशियों की कविताएँ। दोनों अक्सर मिला करते। देर तक बातें करते और साथ में सपने बुनते। सपने, जो अब दोनों के साझा सपने थे। अब दोनों ब्लॉग की सीमा से भी परे हो गए। ब्लॉग के बाहर भी दोनों ने मिलना शुरू कर दिया। लड़का लड़की को उन सभी जगहों पर लेकर जाता जहाँ वो जाना चाहती थी और वे सारी चीज़ें दिखाता जो वो देखना चाहती थी। लड़का लड़की को अपने ब्लॉग पर भी लेकर गया। अपनी रचनात्मकता से भी उसे परिचित कराया।
इस तरह लड़की के पास खूबसूरत लम्हों का खजाना इकठ्ठा होता गया। जब लड़का उसके साथ नहीं होता तो वो इस खजाने की पोटली को खोलती और एक एक लम्हे को याद करके फिर से जीती।
एक दिन लड़के ने लड़की से कहा के वो उससे एकांत में मिलना चाहता है।
"कहाँ?" लड़की ने पूछा।
"कहीं भी" लड़के ने कहा।
"तुम्हारे घर?"
"नहीं, वहाँ नहीं मिल सकते।"
"फिर?"
"फिर जहाँ भी तुम ले चलो।"
फिर लड़की ने अपने सपनों के संसार में एक सपनों का घर बनाया, ब्लॉग से बाहर। लड़की ने उसे नाम दिया - हमारा घर। दोनों उसी सपनों के घर में मिले और वहीं प्रथम बार लड़के के अधरों ने लड़की के अधरों को स्पर्श किया। लड़की असीम सुख में डूब गयी। और वही घर उन दो प्रेम में डूबे देहों के मिलन का गवाह भी बना। लड़की को लगा के अब उसने अपने होने का अर्थ पा लिया है। उसे लगा के अब वो मर भी जाये तो उसे कोई दुःख नहीं होगा। दोनों अब भावनात्मक, वैचारिक, रचनात्मक और दैहिक हर स्तर पर प्यार में डूब चुके थे।
काफी दिनों तक दोनों का प्रेम यूं ही चलता रहा। एक दिन लड़के ने लड़की से कहा कि अब तुम्हे कहानियाँ लिखना चाहिए। लड़की ने लड़के के कहने पर लिखी एक प्रेम कहानी। लड़के ने कहानी की प्रशंसा की और कहा कि इसे आगे बढ़ाओ। तुम्हारा मूल ध्येय सृजन करना है। इसके लिए यदि कुछ त्याग भी करना पड़े तो कोई बात नहीं लिखती रहो। लड़की सम्मोहित हो गयी। लड़का चला गया और लड़की अपने सपनों के घर में बैठकर लिखने लगी।
लड़की अकेले में बैठकर कहानी लिखती और लड़के का इंतजार भी करती रहती। लड़का शाम को आता लड़की का लिखा पढ़ता, तारीफ करता और लड़की को प्यार करता फिर वापस लौट जाता। लड़की फिर से लिखने बैठ जाती। वो लिखती क्योंकि लड़का पढता। लड़के का पढ़ना लड़की के लिखने को सार्थक कर जाता। धीरे धीरे लड़के ने आना भी कम कर दिया। अब वो दो-तीन दिन में एक बार आने लगा। लड़की के कहने पर वो कहता कि वो नहीं चाहता कि उसके आने से लड़की का कार्य बाधित हो। लड़की ने प्रेम की खातिर यह भी स्वीकार कर लिया।
एक बार ऐसा हुआ कि लड़का चार तक भी नहीं आया। लड़की को लड़के की बहुत याद आ रही थी पर उसे लगा शायद लड़का व्यस्त होगा। अगले दिन भी लड़का नहीं आया तो लड़की को चिंता होने लगी। उसने लड़के से संपर्क करना चाहा पर ये भी न हो पाया। लड़की ने फिर भी इंतजार किया पर लड़का अगले दिन भी नहीं आया। अब लड़की की चिंता और बढ़ गई। लड़के के बिना उसे रहा भी नहीं जा रहा था। वो निकल पड़ी लड़के को ढूँढने। सबसे पहले लड़की अपने ब्लॉग पर गई उसी बेंच पर जहाँ वो उससे पहली बार मिली थी। लड़का वहाँ नहीं था। फिर लड़की उन सभी जगहों पर भटकती रही जहाँ जहाँ वो लड़के के साथ गई थी। पर लड़का कहीं भी नहीं मिला।








