गुरुवार, 25 नवंबर 2010

आँख मूँद कर पढ़ने वाले उर्फ़ चाट और कुल्फी

ड़ा ही अजीब लड़का था वो। पर कुछ भी कहो बात तो पते की कह गया।

हुआ यूँ कि उस दिन मैं सब्जी लेने बाज़ार गया था। तो जब एक चाट के ठेले के पास खड़ा सोच रहा था कि कौन सी सब्जियाँ ली जाएँ एक लड़का अचानक चाट वाले के पास पहुँचा और जोर से बोला- "भाई एक कुल्फी देना।"

चाट वाले से कुल्फी? सुनकर मेरे कान खड़े हो गए। बड़ा बेवकूफ़ है, मैने सोचा और उसकी तरफ़ निगाह फेरी।

सोचा चाट वाले ने भी यही होगा, बोला- "अरे भाई दिखता नहीं क्या? मैं चाट बेच रहा हूँ, कुल्फी नहीं।"

"कुल्फी तो देना ही पड़ेगा। तुम्हारे ठेले पर तुमने लिखवा जो रखा है- श्री कुल्फी सेंटर।" सचमुच लिखा तो यही था उस ठेले पर, मैने भी ध्यान दिया।

"अरे भाई पहले इस ठेले पर कुल्फियां बेचता था पर अब तो चाट बेच रहा हूँ न।"

"अब चाट बेच रहे हो तो नाम क्यों नहीं बदलवाया? कुल्फी तो तुम्हे देनी ही पड़ेगी।"

"अरे नहीं बदलवाया तो क्या जान लोगे। चाट खाना है तो खाओ नहीं तो मेरा टाइम खोटा मत करो। ग्राहक खड़े हैं।"

"नहीं, खा के मैं कुल्फी ही जाउँगा चाहे कहीं से लाओ। अब गलती तुम्हारी है तो मैं क्यों भुगतूं।"

"अरे पागल है क्या, भाग यहाँ से" चाट वाले को अब गुस्सा आ गया। और बस दोनो मे बहस शुरु हो गई।

कुछ देर तक तो मैं बहस का मजा लेता रहा फिर मुझसे रहा नहीं गया। लड़के को मैने एक तरफ खींचा और कहा - "क्यों उस गरीब को परेशान कर रहे हो यार?"

" अरे साहब मैं कोई जानबूझ कर परेशान नहीं कर रहा हूँ, मैं तो बस परंपरा का पालन कर रहा हूँ. "

" परंपरा का पालन? मैं समझा नहीं?"

"देखिए जनाब हमारे यहाँ एक परंपरा यह भी रही है के जो पढ़ो उसी पर यकीं करो जो देखो सुनो उसे झुठला दो। तो आखिर मैं भी तो यही कर रहा हूँ न?"

"अच्छा! पर बात कुछ समझ नहीं आई।"

शनिवार, 13 नवंबर 2010

यह अपना क्षेत्र नहीं है...

उस दिन की बात है। मैं चौराहे की चाय की दुकान के सामने खड़ा था। इंजीनियरिंग के कुछ छात्र भी वहाँ चाय की चुस्कियाँ मार रहे थे। तभी एक बाइक में दो पुलिस वाले वहाँ आए। एक तो पास की पान की दुकान की तरफ बढ़ गया, दूसरा जिसके हाथ में एक रज़िस्टर था उन लड़कों के पास आया। कुछ क्षण वह खड़ा होकर अपने रज़िस्टर में देखता रहा फिर उन लड़कों से मुख़ातिब होकर कहा- 

"आप लोग कहाँ रहते हैं?"

"साकेत नगर में!" एक ने कहा।

"क्या करते हो?"

"जी, हम लोग स्टुडेँट हैं, बी. ई. कर रहे हैं।" दूसरे ने कुछ हिचकिचाते हुए कहा।

"तो किराये से रहते होगे?"

"जी सर!" लड़को के साथ मैं भी सोच रहा था कि ये सब क्यों पूछा जा रहा है।

"आप लोगों ने पुलिस थाने में अपनी डिटेल्स दर्ज करवायी है?"

"जी..." लड़के एक दुसरे का मुंह देख रहे थे।

"अच्छा आपने अपने मकान मालिक को अपनी फोटो और एड्रेस वगैरह दिया है?"

"हाँ सर" एक लड़के ने धीरे से कहा, बाकी चुप रहे।

"देखिये घबराइये नहीं, आप लोगों को तो पता ही होगा कि हर मकान मालिक के लिए अपने किरायेदार की पूरी जानकारी थाने मे लिखवाना जरूरी होता है। आजकल वारदात बहुत हो रहे हैं न बेटा।" लड़कों ने सर हिलाया।

"लेकिन ज्यादातर मकान मालिक ऐसा करते नहीं है। अब कल को कुछ हुआ तो परेशान तो आपको ही होना पड़ेगा न? पर ये समझते ही नहीं हैं।"

"सही बात है सर।" लड़के सोच रहे होंगे कहाँ से आफ़त गले पड़ गई।

"इसीलिए हम लोग खुद ही घर घर जाकर जानकारी जुटा रहे हैं। और इसमे घबराने की कोई बात नहीं है भई ये आप लोगो की सुरक्षा के लिए ही कर रहे हैं।"

"हाँ सर ये तो है।" एक लड़के ने दांत निपोरे। उस पुलिस वाले को इतने प्यार से समझाते देख मुझे जाने क्यों अच्छा लग रहा था।

बुधवार, 3 नवंबर 2010

बाज़ार से गुजरा हूँ खरीदार नहीं हूँ...

रात की ओर अग्रसर शाम। मैं "न्यू मार्केट" में घूम रहा हूँ। पूरा बाज़ार सजा हुआ है। दीवाली की रौनक है। दुकानदारोँ ने दुकान के बाहर भी दुकान लगा रखी है। सारे फ़ुटपाथ पर छोटे बड़े व्यापारियों ने कब्जा कर रखा है। पैदल चलना भी दूभर है। भीड़ भी बहुत ज्यादा है। ऐसा लग रहा है मानो कोई मेला लगा हो। वैसे अतिक्रमण की समस्या तो स्थायी है। बीच बीच मे इन्हे हटाने का अभियान चलता है पर फिर वही हाल हो जाता है। इसका सबसे ज्यादा असर किसी भी रविवार को देखा जा सकता है इस दिन जैसे आधा शहर यहीं आ जाता है और सड़कों और फुटपाथों पर लगी दुकानों के बीच आप सरक सरक कर ही आगे बढ़ सकते हैं। लेकिन आज तो किसी भी आम रविवार से भी ज्यादा ख़राब हालत है। यही हाल पार्किंग का है, गाड़ी खड़ी करने के लिए जगह पाना किसी जंग के जीतने से कम नहीं है।

मैं बाज़ार के अंदर  हूँ। हर तरफ़ रोशनी और रंगीनियाँ छाई हैं। सारे दुकानदार ग्राहकों को लुभाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। मन करता है सब कुछ खरीद लें। ढ़ेर सारे स्टॉल उन चीज़ों से भरे पड़े हैं जो खास तौर पर दीवाली के समय ही मिलती हैं। इनमे सजावट और पूजन सामग्रियों से लेकर खाने पीने की वस्तुयेँ शामिल हैं। तभी एक बच्चे पर नज़र जाती है जो आती जाती महिलाओं और लड़कियों को रोककर कह रहा है- " दीदी नाड़ा लीजिये, आंटी नाड़ा लीजिये।" बच्चे के हाथ में प्लास्टिक का चौकोर पात्र है जिसमे नाड़े के बंडल हैं। फिर ध्यान जाता है पूरे बाज़ार मे ऐसे कितने ही 10 से 14 साल के बच्चे विभिन्न सामान बेच रहे हैं हैं। सड़क किनारे दुकान फैलाकर या घूम घूम कर बैग, कपड़े, सजावटी चीज़ें, सस्ते इलेक्ट्रॉनिक आइटम और न जाने क्या क्या ये बेचते हैं। अक्सर इन्हे देखता हूँ और राजेश जोशी की कविता " बच्चे काम पर जा रहे हैं" की पंक्तियां दोहराता हूँ। ये बच्चे शायद काम करने के लिये ही अभिशप्त हैं।

शनिवार, 23 अक्टूबर 2010

वापसी: एक अरसे के बाद

एक मुद्दत के बाद इस चिठ्ठे पर कोई पोस्ट कर रहा हूँ। लगभग साढ़े तीन साल के बाद। पर इसका यह मतलब कतई नहीं है कि मैं पुराना चिट्ठाकार हूँ, दरअसल तब नया-नया चिटठा जगत से परिचित हुआ था तो सोचा मैं  भी चिटठा बना लूँ सो बना लिया। पर कुल जमा चार-पांच पोस्ट तक आकर ही रुक गया सो कायदे से चिट्ठाकार भी न बन पाया। तब कुछ व्यस्तताएँ और चिंताएँ ऐसी थीं कि मेरी प्राथमिकताओं में ब्लॉगिंग बहुत नीचे चला गया था। तो चिट्ठे से एक दूरी सी बन गई जो कि वक्त के साथ बढ़ती गई। फिर कुछ ऐसी भी बातें थीं जिनके चलते ब्लॉगिंग मे मेरी रुचि भी कम हो गई। लिखना भले ही बंद कर दिया हो पर अपने पसंद के चिट्ठों को कभी कभार पढ़ जरूर लेता था। हालाँकि नियमित नहीं रहा। फिर यह हुआ कि चिट्ठा जगत से ही दूर हो गया।

काफी अरसे के बाद एक बार फिर चिट्ठा जगत में प्रविष्ट हुआ। बहुत से बदलाव देखने को मिले। हिन्दी चिट्ठाकारों की संख्या भी कई गुना बढ़ चुकी है। वैसे तो तब भी  कम चिट्ठाकार नहीं थे। ( अफ़सोस हे कि यह भी नहीं कह सकता कि तब से हिंदी चिट्ठाकारी से जुड़ा हूँ जब यह अपने शुरुआती दौर मे था ) कुछ चीज़ें अच्छी लगी तो कुछ बुरी भी लगी। खैर ये चर्चा फिर कभी सही।

तो साहब पिछले कुछ दिनों से फिर से चिट्ठाकारी शुरू करने का मन बना रहा था, शायद अब इसके लिए
थोड़ा समय भी निकाल सकूँ। पहले सोचा नया चिठ्ठा बनाऊं फिर सोचा जब बना बनाया रखा ही है तो क्यों उसी मरे हुए ब्लॉग को फिर जिंदा किया जाए। तो नतीजा आपके सामने है अपने पुराने चिट्ठे को घिस-घिसु के, चमका-धमका के, रंगाई- पुताई कर के फिर से बाज़ार मे उतार दिया। पुराना कबाड़ (पोस्ट और टिप्पणियाँ ) साफ़ नहीं किया ताकि सनद रहे कि हम पहले भी चिट्ठाकारी कर चुके हैं।

अब देखते हैं इस बार ये सिलसिला कहाँ तक जाता है !!!

रविवार, 8 अप्रैल 2007

वो जो एक पेड़ था

प्रकृति की सर्वोत्तम कृति है मनुष्य। और आज यही मनुष्य प्रकृति को नष्ट किये जा रहा है। अंधाधुंध पेड़ों की कटाई, प्रदुषण, पानी का अपव्यय, जैव चक्र में असंतुलन यह सब मानव ही तो कर रहे हैं। इन सबके दूरगामी परिणामों से परिचित होते हुए भी हम कहाँ बाज आ रहे हैं। कुछ मुट्ठी भर लोग ही हैं जो इस दिशा में प्रयास कर रहे हैं, पर कई बार हम चाहते हुए भी कुछ नहीं कर पाते हैं। केवल बेबसी से देखते ही रह जाते हैं। ऐसी ही बेबसी की स्थिति में मैने यह कविता लिखी थी, जो आप सभी सुधिजन के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ। चाहें तो इसे नज़्म भी कहा जा सकता है क्योंकि मैने इसे इसी शक्ल में लिखने की कोशिश की है। इस रचना की कमियों की तरफ़ आप ध्यान देंगे और मुझे अवगत कराएंगे इस उम्मीद के साथ यहाँ दे रहा हूँ।


वो जो एक पेड़ था

मैं उस पेड़ को कटने से बचा न सका
वो जो एक कर्ज था उसे मैं चुका न सका

वो पेड़ जो उस बंगले के आँगन में खड़ा था
इशारे करके मुझे धीरे से बुलाता था
कभी छूकर नहीं देखा था मैने उसको
फिर भी एक रिश्ता था कोई हममें
ऐसा लगता था कि कोई पुराना साथी है
जो कि कई मुद्दतों का बिछुड़ा हो
उस नीम, उस पीपल या उस बरगद की तरह
जिनकी बाहोँ में था बचपन गुजरा

और उस दिन मैने वहाँ देखा हत्यारों को
साथ अपने वे हथियार लेके आए थे
वे उस पेड़ के ही खून के प्यासे थे
जान लेने को उसकी अमादा थे
मेरे दोस्त ने तब मुझको ही पुकारा था
उसकी आवाज़ में, चेहरे में एक दर्द सा था
घबरा गया था उसको देखकर मैं भी तो
कुछ तो करना है मुझे मैने ये सोचा था

बंगले के मालिक से मैं मिलने तो गया
बात उससे मगर अपनी मनवा ना सका
वो ऊंचे महलों का और मैं जमीं का था
शायद यही खौफ़ मेरे दिल मैं था
मैं डर गया था उससे नहीं लड़ पाया
और उस पेड़ को यूँ ही कट जाने दिया
देखता रहा उसके टुकड़ों के टुकड़े होते
कितना कायर था कि कुछ कर भी न सका

हाँ एक कर्ज ही तो था जिसे चुका न सका
कि उस पेड़ को कटने से भी बचा न सका

- सोमेश सक्सेना

मंगलवार, 20 मार्च 2007

भारत २० वर्ष बाद - एक स्वप्न

इससे पहले कि आप इसे पढ़ें मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि यह मेरी कल्पना नहीं है। लगभग दो साल पहले मेरे मेल मे यह मैसेज आया था। जिसने मुझे भेजा था उसे किसी और ने फारवर्ड किया था, उस फारवर्ड करने वाले को किसी और ने किया था। इस तरह फारवर्डिंग का लम्बा सिलसिला था इसलिये यह बताना लगभग असम्मभव है कि इसे किसने लिखा था। मुझे अच्छा लगा था इसलिये यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ। उक्त लेख अंग्रेजी में था मैने सिर्फ़ इतना किया है कि इसे हिन्दी में अनुदित कर दिया है। इसके अतिरिक्त यथास्थान कुछ परिवर्तन भी किये हैं। यदि आपको यह पसंद आये तो उस अन्जान लेखक को धन्यवाद करें, पसंद न आये तो मुझे कोसे कि कहाँ - कहाँ से कूड़ा-कचरा ढूढ़ लाता है।
भारत २० वर्ष बाद - एक स्वप्न वार्तालाप
वर्ष 2027
IBM, USA में दो अमेरिकी
अलेक्स: हेलो मेक कैसे हो? कल ऑफिस क्यों नहीं आए थे?
मेक: हाय अलेक्स, कल मैं भारत का वीज़ा लेने के लिये भारतीय दूतावास गया था।
अलेक्स: सचमुच! क्या हुआ? मैने सुना है आजकल यह बहुत मुश्किल है।
मेक: हाँ है तो पर मैने किसी तरह प्राप्त कर लिया।
अलेक्स: कितना वक़्त लगा?
मेक: मत पूछो यार, बहुत लम्बी लाइन लगी थी। बिल गेट्स मेरे आगे खड़ा था और उन लोगो ने उसे बहुत परेशान किया। इसीलिये इतना समय लगा। छः घंटे मैं खड़ा रहा।
अलेक्स: सचमुच, भारत में USA का वीज़ा लेने में एक घंटे से अधिक नहीं लगता।
मेक: हाँ, पर ऐसा इसलिये क्योंकि भारत से भला कौन यहाँ आना चाहेगा। उनका आर्थिक ढांचा दिनो-दिन मजबूत होता जा रहा है।
अलेक्स: तो कब जा रहे हो तुम?
मेक: जैसे ही मुझे भारत की अपने कम्पनी से टिकिट मिल जाएंगे तुरंत निकल जाउंगा। और पता है मुझे इंडियन एअरलाइंस मे यात्रा करने का अवसर मिल रहा है, ये एक सपने के सच होने जैसा है।
अलेक्स: तुम वहाँ कितने दिन रूकने वाले हो?
मेक: कितने दिन से तुम्हारा क्या मतलब है? मैं तो वहीं सैटल होना चाहता हूँ। मेरी कम्पनी ने मुझसे वादा किया है कि वो मुझे हरा पत्र (Green Card) दिलवाएगी।
अलेक्स: बहुत भाग्यशाली हो, भारत में हरा पत्र पाना बहुत मुश्किल है।
मेक: हाँ है तो, इसीलिये मैं वहाँ किसी भारतीय लड़की से शादी करने की सोच रहा हूँ।
अलेक्स: पर चेन्नई, बंगलुरु, मुम्बई जैसे शहरों में तुम्हे बहुत सी अमेरिकी लड़कियाँ मिल जाएंगी।
मेक: पर मैं भारतीय लड़कियों को पसंद करता हूँ क्योंकि वे ख़ूबसूरत और सुसंस्कृत होती हैं।
अलेक्स: तुम्हे कहाँ से ऑफर मिला? चेन्नई से?
मेक: हाँ, वेतन बहुत अच्छा है पर बहुत महंगा शहर है। एक सिंगल रूम का एक दिन का न्यूनतम किराया है 1000/- रु०
अलेक्स: बाप रे! हम अमेरिकी लोगो के लिये तो ये बहुत महंगा है क्योंकि Rs 1/- = $ 100 हे भगवान। बेंगलुरू और मुम्बई कैसे हैं?
मेक: कह नहीं सकता। पर इससे कम क्या होंगे?
अलेक्स: मैने सुना है कि सभी भारतीयों के पास पर्सनल रोबोट्स होते हैं?
मेक: तुम 5ooo/- रु० में एक BMW कार ले सकते हो। रु० 7500/- से भी कम मे रोबोट।
अलेक्स: वैसे तुम्हारा क्लाइंट कौन है?
मेक: अयंगर एन्ड अयंगर एसोसिएट्स, एक पूर्ण भारतीय कम्पनी। साफ्ट्वेयर के क्षेत्र मे इसकी सानी नहीं है।
अलेक्स: बड़े भाग्यशाली हो कि एक भारतीय कम्पनी में काम करने का मौका मिल रहा है। बड़े ही सुव्यवस्थित होते हैं और वेतन भी अच्छा देते हैं। हमारी अमेरिकी कम्पनियों से तो कहीं अच्छी हैं
अभी कुछ दिन पहले ही मेरा एक दोस्त अपनी छुट्टियाँ बिताने ’बिहार’ गया था, जो भारत की सबसे ज्यादा सुरक्षित और रहने लायक जगह है, बल्कि शायद दुनिया की। वहाँ आपको पूरी आज़ादी होती है। आप जो चाहे कर सकते हैं। कोई डर नहीं है। मैं हमेशा चकित रहता हूँ कि उस प्रदेश ने इतनी अच्छी व्यवस्था कैसे बना कर रखी है।
मेक: बिल्कुल, तुम सच कह रहे हो। उम्मीद है अमेरिका भी उनके पदचिन्हों पर चलेगा।
अलेक्स: तुम्हे वहाँ भाषा की कोई दिक्कत तो नहीं आएगी न?
मेक: बिल्कुल भी नहीं, मै न्यूयार्क के अपने स्कूल के दिनो से ही हिन्दी को फर्स्ट लेंग्वेज के रूप में पढ़ रहा हूँ। चुनने से पहले उन्होने मेरी हिन्दी की परीक्षा भी ली थी। और TOHIL ( Test of Hindi as International Language) में मेरे शत प्रतिशत स्कोर से वे बहुत प्रभावित हुए।
क्या ये स्वप्न कभी सच हो सकता है ? ये हम सब पर निर्भर करता है। एक नये भारत के लिये शुभकामनाएँ - सोमेश सक्सेना